(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.17. अध्यायः 017
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीमप्रति युधिष्ठिरवचनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-17-0x(5862)(71779)
असंतोषः प्रमादश्च मदो रागोऽप्रशान्तता।
बलं मोहोऽभिमानश्चाप्युद्वेगश्चैव सर्वशः॥ 12-17-1(71780)
एभिः पाप्मभिराविष्टो राज्यं त्वमभिकाङ्क्षसे।
निरामिषो विनिर्मुक्तः प्रशान्तः सुसुखी भव॥ 12-17-2(71781)
य इमामखिलां भूमिं शिष्यादेको महीपतिः।
तस्याप्युदरमेकं वै किमिदं त्वं प्रशंससि॥ 12-17-3(71782)
नाह्ना पूरयितुं शक्यां न मासैर्भरतर्षभ।
अपूर्यां पूरयन्निच्छामायुषाऽपि न शक्नुयात्॥ 12-17-4(71783)
यथेद्धः प्रज्वलत्यग्निरसमिद्धः प्रशाम्यति।
अल्पाहारतयाग्निं त्वं शमयौदर्यमुत्थितम्॥ 12-17-5(71784)
आत्मोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विशसं बहु।
जयोदरं पृथिव्या ते श्रेयो निर्जितया जितम्॥ 12-17-6(71785)
मानुषान्कामभोगांस्त्वमैश्वर्यं च प्रशंससि।
अभोगिनोऽबलाश्चैव यान्ति स्थानमनुत्तमम्॥ 12-17-7(71786)
योगः क्षेमश्च राष्ट्रस्य धर्माधर्मौ त्वयि स्थितौ।
मुच्यस्व महतो भारात्त्यागमेवाभिसंश्रय॥ 12-17-8(71787)
एकोदरकृते व्याघ्रः करोति विशसं बहु।
तमन्येऽप्युपजीवन्ति मन्दवेगतरा मृगाः॥ 12-17-9(71788)
विषयान्प्रतिसंगृह्य संन्यासे कुरुते मतिम्।
न च तुष्यन्ति राजानः पश्य बुद्ध्यन्तरं यथा॥ 12-17-10(71789)
पत्राहारैरश्मकुट्टैर्दन्तोलूखलिकैस्तथा।
अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च तेरयं नरको जितः॥ 12-17-11(71790)
यस्त्विमां वसुधां कृत्स्नां प्रशासेदखिलां नृपः।
तुल्याश्मकाञ्चनो यश्च स कृतार्थो न पार्थिवः॥ 12-17-12(71791)
संकल्पेषु निरारम्भो निराशीर्निर्ममो भव।
अशोकं स्थानमातिष्ठ इह चामुत्र चाव्ययम्॥ 12-17-13(71792)
निरामिषा न शोचन्ति शोचन्ति त्वामिषैषिणः।
परित्यज्यामिषं सर्वं मृषावादात्प्रमोक्ष्यसे॥ 12-17-14(71793)
पन्थानौ पितृयानश्च देवयानश्च विश्रुतौ।
ईजानाः पितृयानेन देवयानेन मोक्षिणः॥ 12-17-15(71794)
तपसा ब्रह्मर्येण स्वाध्यायेन महर्षयः।
विमुच्य देहांस्ते यान्ति मृत्योरविषयं गताः॥ 12-17-16(71795)
आमिषं बन्धनं लोके कर्मेहोक्तं तथाऽऽमिषम्।
ताभ्यां विमुक्तः पापाभ्यां पदमाप्नोति तत्परम्॥ 12-17-17(71796)
अपि गाथां पुरा गीतां जनकेन वदन्त्युत।
निर्द्वन्द्वेन विमुक्तेन मोक्षं समनुपश्यता॥ 12-17-18(71797)
अनन्तं बत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किंचन।
मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे किंचित्प्रदह्यते॥ 12-17-19(71798)
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य न शोचेच्छोचतो जनान्।
जगतीस्थोऽथवाऽद्रिस्थो मन्दबुद्धिर्नचेक्षते॥ 12-17-20(71799)
दृश्यं पश्यति यः पश्यन्स चक्षुष्मान्स बुद्धिमान्।
अज्ञातानां च विज्ञानात्संबोधाद्रुद्धिरुच्यते॥ 12-17-21(71800)
यस्तु मानं विजानाति बहुमानमियात्स वै।
ब्रह्मभावप्रभूतानां वैद्यानां भावितात्मनाम्॥ 12-17-22(71801)
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा॥ 12-17-23(71802)
ते जनास्तां गतिं यान्ति नाविद्वांसोऽल्पचेतसः।
नाबुद्धयो नातपसः सर्वं बुद्धौ प्रतिष्ठितम्॥ ॥ 12-17-24(71803)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि सप्तदशोऽध्यायः॥ 17॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-17-5 इद्धः प्रदीप्तः॥ 12-17-6 विशसं विशसनम्॥ 12-17-7 अबलास्तपःकृशाः॥ 12-17-8 अलब्धलाभो योगः। लब्धसंरक्षणं क्षेमः॥ 12-17-21 दृश्यं द्रष्टुं योग्यं कर्तव्यमकर्तव्यं च॥ 12-17-22 यस्तु वाचं विजानातीति झ. पाठः॥ 12-17-24 ते बुद्धिमन्तः॥


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